Thursday, January 26, 2012


  • ईर्ष्या
    सत्येश्वर, तेरा आदेश है कि सभी लोग आपस में टकराये बिना अपनी प्रगति करें पर मनुष्य में ऐसी मूढ़ता पाई जाती है कि वह अपनी प्रगति की अपेक्षा दूसरों की प्रगति में बाधा डालना अधिक पसंद करता है, इसी की अधिक चिंता करता है इस ईर्ष्या से लाभ किसी का नहीं होता, किन्तु दूसरे की उन्नति मन में चुभने से मन घायल होता है इस निरर्थक पाप से मुझे बचाये रख परन्तु प्रभु, दुनिया में जब पाप से भी मनुष्य पद वैभव कीर्ति आदि पा जाता है, तब मनुष्य पाप की तरफ प्रेरित होने लगता है और पुण्य के बारे में उत्साह छोड़ देता है, इसलिए पाप इस प्रकार सफल न हो पाये, इसकी चिंता करना जरूरी है इस ढंग की ईर्ष्या दिव्या ईर्ष्या है ऐसी ईर्ष्या मुझ में बनी रहे यह स्वपर कल्याणके लिए जरूरी मानता हूँ और किसी की उन्नति में बाधा डालकर प्रतियोगिता के क्षेत्र में जो ईर्ष्या होती है, वह अपना उत्साहबढाने के लिए जरूरी है, इसलिए ऐसी मानवीय ईर्ष्या के लिए तू मुझे क्षमा कर खेल कूद क्रीडा
    विनोद में जो प्रतियोगिता होती है, वह मानवीय ईर्ष्या है उसे भी क्षमा कर हाँ, मेरी मानवीय ईर्ष्या कभी पाशविक या शैतानी ईर्ष्या न बन जाये इस प्रकार मैंबिना उचित साधना के फल की आशा न करने लगूँ न्याय, अन्याय का विवेक न भूल जाऊं या किसी निरपराध को गिराने न लगूँ, इतना विवेक, इतना संयम देने की कृपा करता रह

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